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किसानों के नाम पर पकाई जा रही सियासत की फसल? SBI की रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे
October 14, 2020 • Anil Kumar

एसबीआई की शोध टीम द्वारा किए गए एक शोध अध्ययन में पाया गया है कि किसानों का चल रहा आंदोलन एमएसपी के कारण नहीं, बल्कि राजनीतिक हित के लिए है। कुछ राज्य मंडी करों और शुल्क से राजस्व के नुकसान को लेकर चिंतित हैं।

 

देश में हरियाणा और पंजाब तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश का कुछ इलाका ही ऐसा है, जहां हाल ही में पास हुए कृषि विधेयकों का विरोध हो रहा है। किसानों के प्रदर्शन के नाम पर राजनीतिक दलों की सियासी तिकड़मबाजी भी हालिया दौर में खूब देखने को मिल रही। राजनीतिक दल जानते हैं कि यदि वे किसान-किसान नहीं करेंगे तो उनकी राजनीति को धक्का पहुंचने की आशंका बलवती होती रहेगी। जबकि असलियत यह है कि इन आंदोलनों में किसान कम और किसान के नाम पर राजनीति करने वाले दलों के कार्यकर्ता अधिक सक्रिय रहे। इन सब के बीच भारतीय स्टेट बैंक की शोध में कुछ चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। एसबीआई की शोध टीम द्वारा किए गए एक शोध अध्ययन में पाया गया है कि किसानों का चल रहा आंदोलन एमएसपी के कारण नहीं, बल्कि राजनीतिक हित के लिए है। कुछ राज्य मंडी करों और शुल्क से राजस्व के नुकसान को लेकर चिंतित हैं। यह वर्तमान में पंजाब में 8.5% (6% मंडी टैक्स और केंद्रीय खरीद से निपटने के लिए 2.5% शुल्क) से लेकर कुछ अन्य राज्यों में 1% से कम है। 

SBI की रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे

एसबीआई समूह के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष के नेतृत्व में एक टीम द्वारा किए अध्ययन में यह भी पाया गया है कि हरियाणा के अलावा, कोई भी अन्य राज्य के किसान इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार (e-NAM) मंडियों में अपनी फसल नहीं बेचते हैं। पंजाब के मामले में, जहां कृषि परिवारों की वार्षिक आय लगभग 2.8 लाख रुपये है, केवल 1% किसान ई-एनएएम से जुड़े हैं।

सिर्फ 19 प्रतिशत परिवारों को है MSP की जानकारी 

भारत में कृषि परिवारों की स्थिति के प्रमुख संकेतकों पर राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 70 वें दौर के सर्वेक्षण के अनुसार, औसतन केवल 19% परिवारों को एमएसपी के बारे में पता है। 15% खरीद एजेंसी के बारे में जानते हैं। केवल 7% परिवार खरीद एजेंसी को फसल बेचते हैं और कुल फसलों का केवल 10% एमएसपी पर बेचा जाता है। अध्ययन के अनुसार लगभग 93% परिवार खुले बाजार में सामान बेचते हैं और उन्हें बाजार की खामियों का सामना करना पड़ता है। 

खरीद की लोपेड प्रणाली 

भारत 1960 के दशक में लागू की गई मुख्य रूप से अनाज की खरीद की विरासत और लोपेड प्रणाली का पालन करता है जो उत्तर भारत के अनाज वाले राज्यों मुख्य रूप से पंजाब और हरियाणा को लाभान्वित करता है। खाद्यान्न खरीद के बुनियादी ढांचे के निर्माण का एक बड़ा हिस्सा ऐसे राज्यों के आसपास बनाया गया है। जबकि चावल उत्पादन में यूपी और पश्चिम बंगाल पहले और दूसरे नंबर पर हैं, ऐसे राज्यों से भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) द्वारा अनाज की खरीद केवल 18% है। लेकिन पंजाब और हरियाणा में जहां चावल का उत्पादन बेहद कम है वहां एफसीआई द्वारा औसत खरीद अभी भी 90% है।

Source: Agency News